नई दिल्ली। हल्द्वानी मे रेलवे की जमीन पर अवैध कब्जे को हटाने के खिलाफ दाखिल याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट का अहम आदेश सामने आया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अपील करने वाले लोगों को यह अधिकार नहीं है कि वो उसी जगह पर रहने की व्यवस्था की मांग करे। यह जमीन रेलवे की है। उन्हें तय करने का अधिकार है कि जमीन का उपयोग कैसे किया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उन परिवारों की पहचान की जाए जो विस्थापन से प्रभावित होंगे। विस्थापित होने की सूरत में रेलवे और राज्य सरकार ने कहा सामूहिक रूप से शिफ्टेड परिवारों को 6 महीने तक प्रति महीने 2 हजार रुपये देंगे।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि रेलवे के लिए ये जमीन बहुत महत्वपूर्ण है। इसलिए पात्र व्यक्ति प्रधानमंत्री आवास योजना के लिए अप्लाई कर सकते हैं, जो EWS सेक्शन से आते हैं। केंद्र और राज्य सरकार, नैनीताल जिले की रेवेन्यू ऑथोरिटी वहां कैंप लगाएं और सुनिश्चित करें कि सभी पात्रों को प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत फॉर्म भर सकें। एक हफ्ते का कैंप लगाएं। बनभूलपुरा में पुनर्वास केंद्र बनाएं जाए। और हर परिवार का हेड यहां पर जाए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 19 मार्च यानि की ईद के बाद कैंप लगाएं।
सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया है कि नैनीताल जिलाधिकारी, SDM हल्द्वानी लॉजिस्टिक्स सपोर्ट प्रदान करें ताकि पीएम आवास योजना के फॉर्म कलेक्ट हो सकें। सभी परिवार आवास के लिए फॉर्म भर लें, ये सुनिश्चित किया जाए। सामाजिक कार्यकर्ता घर-घर जाकर लोगों को पीएम आवास योजना के बारे में बताएं। नैनीताल के जिलाधिकारी सुनिश्चित करें कि हर पात्र परिवार को पीएम आवास मिल सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि इस मामले पर अप्रैल में दोबारा सुनवाई होगी। अगली सुनवाई तक रेलवे जमीन पर अतिक्रमण हटाने की कोई कार्रवाई नहीं होगी। हालांकि, इस मामले में दी गई सुरक्षा उत्तराखंड में दूसरे अवैध कब्जे के मामले पर लागू नहीं होगा। केन्द्र सरकार की तरफ से सुप्रीम कोर्ट को बताया गया कि राज्य सरकार और रेलवे ने अपना जवाब दाखिल किया है। 13 जमीनों पर फ्री होल्ड है, राज्य और रेलवे दोनों हर्जाना देंगे। रेलवे को ट्रैक बढ़ाने की सख्त आवश्यकता है। नदी की वजह से दिक्कत हो रही है।
याचिकाकर्ताओं की तरफ से वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि रेलवे ने बिना प्लान बताए कह दिया कि 36 एकड़ जमीन देने की जरूरत है। एक्सपेंशन प्लान नहीं बनाया। इस इलाके में 50000 लोग रह रहे हैं। ऐसा कोई रास्ता नहीं है कि एक साथ 5000 परिवारों को प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत घर दे दिया जाए। हमने एक मैप बनाया है, उसे कोर्ट देखे, हमने इसे कोर्ट में जमा भी किया है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सरकार की तरफ से कहा गया है कि जो सरकारी जमीन पर अवैध रूप से बसे हैं उन्हें हटाना ही होगा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ये सरकार की जमीन है, इस पर आखिरकार कब्जा है ही, जिसे हटना चाहिए। इसका विरोध करते हुए प्रशांत भूषण ने कहा कि ये बाद में रेगुलराइज किया गया था। प्रशांत भूषण ने कहा कि ये पट्टे की जमीन है और रेलवे ने इससे पहले कभी भी इस जमीन की मांग नहीं की। रेलवे के पास पहले ही बनभूलपुरा के बगल में ही खाली जमीन पड़ी है। अगर रेलवे को वाकई में जमीन की जरूरत है तो इसका इस्तेमाल करें।
प्रशांत भूषण की दलील पर CJI ने नाराजगी जताते हुए कहा कि कब्जा करने वाले थोड़े ही तय करेंगे कि आखिरी रेलवे को किस जमीन का इस्तेमाल करना है। प्रशांत भूषण ने दलील दी कि जो लोग योग्य हैं उन्हें तो सरकारी आवास मिल जाएगा लेकिन क्या सरकार मानती है कि 5000 परिवार वहां पर हैं। वहां खाली जमीन रेलवे के पास पड़ी है। रेलवे हवा में बात कर रहा है। रेलवे ने हाई कोर्ट के सामने एक्सपेंशन प्लान को लेकर कुछ नहीं कहा था। पुनर्वास के लिए सुप्रीम कोर्ट पहले ही एक विस्तृत आदेश दे चुका है।
केन्द्र सरकार की तरफ से कहा गया कि हल्द्वानी उत्तराखंड में आखिरी जगह है जहां तक रेलवे का विस्तार हो सकता है। इसके बाद पहाड़ का इलाका शुरू हो जाता है। केंद्र सरकार की तरफ ASG ऐश्वर्या भाटी ने कहा कि सरकार लोगों के विस्थापन के बाद जो पात्र हैं उनको 6 महीने तक भत्ता दिया जाएगा।
केन्द्र सरकार की दलील पर प्रशांत भूषण ने कहा कि यहां करीब 30 हजार लोग ऐसे हैं जो पिछले 60-70 साल से रह रहे हैं, सभी को मकान नहीं मिलेगा। क्या सरकार सबको मकान दे पाएगी? दिल्ली की झुग्गी पॉलिसी में तो दूसरी जगह मकान देने के लिए कट ऑफ डेट है। ऐसे में सबका पुनर्वास हो जाए ये संभव नहीं है। CJI सूर्यकांत ने कहा कि हम खराब परिस्थितियों में झुग्गियों में रहने वालों के प्रति पूरी हमदर्दी रखते हैं। सबको साथ सुथरी और बेहतर जगह रहने का अधिकार है।


