Aug 01 2026 / 10:23 PM

मैसूर में बोले पीएम मोदी- विकसित भारत की कमान युवाओं के हाथ

नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज कर्नाटक के मैसूरु में स्वामी विवेकानंद सांस्कृतिक युवा केंद्र ‘विवेक स्मारक’ का उद्घाटन किया। मोदी ने कहा कि हमें इस स्मारक में ऐसे युवाओं को गढ़ना है जिनके लिए राष्ट्र प्रथम ही सर्वोपरि मंत्र हो, मां भारती की सेवा ही जिनका जीवन लक्ष्य हो। स्वामी विवेकानंद जी युवाओं की शिक्षा को राष्ट्र निर्माण का मजबूत आधार मानते थे।

उन्होंने ये देखा था कि कैसे दुनिया के देश अपने युवाओं को शिक्षित बना रहे हैं। लेकिन दुर्भाग्य से तब भारत गुलाम था। भारत के युवा भी गुलामी की जंजीरों में जकड़े हुए थे। उस दौर से लेकर आज तक भारत के युवा ने एक लंबी यात्रा तय की है। भारत का जो युवा कभी जंजीरों में था, आज वो युवा दुनिया के विकास को गति दे रहा है।

पीएम मोदी ने भारत की युवाशक्ति की सराहना करते हुए कहा कि आज भारत की अर्थव्यवस्था सबसे तेज गति से आगे बढ़ रही है, ये सब भारत के युवाओं के सामर्थ्य की वजह से ही हो रहा है। आज भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा स्टार्टअप इकोसिस्टम है, वो भी भारत के युवाओं के सामर्थ्य से है।

आज भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मोबाइल फोन निर्माता बन चुका है वो भी भारत के युवाओं के सामर्थ्य की वजह से ही संभव हुआ है। आज भारत में बने डिजिटल सॉल्यूशंस दुनिया के अनेक देशों के लिए प्रेरणा बन रहे हैं। वो भी भारत के युवाओं के सामर्थ्य से है। आज भारत सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग की नई यात्रा पर तेजी से आगे बढ़ रहा है, वो भी भारत के युवाओं के सामर्थ्य की वजह से है।

युवाशक्ति का स्वास्थ्य, अनुशासित और आत्मविश्वास से भरे रहना बहुत जरूरी है। जो देश खेलों को महत्व देते हैं, वहां के युवाओं में इन तीनों गुणों का तेजी से विकास होता है। इसलिए आज खेलों को राष्ट्र निर्माण को एक महत्वपूर्ण धारा के रूप में देखा जा रहा है।

स्वामी विवेदाकानंद के विषय में बताते हुए प्रधानमंत्री बोले, व्यक्ति से विभूति का निर्माण एकाएक नहीं होता, इसके लिए हमें जीवन की अनगिनत परीक्षाएं देनी होती हैं, साधना करनी होती है, तप करना होता है, खुद को तपाना पड़ता है, खपाना पड़ता है। ख्याति के बाद तो संसार पीछे खड़ा होता है। लेकिन तप के समय महान विभूतियों को पहचानना आसान नहीं होता। जो साधक को तपस्या में पहचानता है, वो उसकी सिद्धि का सहभागी भी होता है।

करीब 130 वर्ष पहले स्वामी विवेकानंद एक युवा संन्यासी के रूप में भ्रमण करते हुए मैसूर आए थे तब उनकी प्रसिद्धि वैसी नहीं थी लेकिन विचार उतने ही ऊंचे थे। उस समय उन्हें जिन लोगों ने पहचाना, जो उनके साथ जुड़े उनमें से एक प्रमुख नाम मैसूरु के तत्कालीन महाराजा का भी था।

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